सपा ने सिर्फ़ पसमांदा मुसलमानो को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया हैं-वसीम राईन

सपा ने सिर्फ़ पसमांदा मुसलमानो को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया हैं-वसीम राईन

देश में कुल मुस्लिम आबादी में 85 फीसदी पसमांदा मुसलमान है जबकि 15 फीसदी अशराफ (सवर्ण) है। अवगत कराना होगा कि इस्लाम से जुड़ी किताबो से ही जात बिरादरी साबित हैं इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नही है। उस लिहाज से पसमांदा यानी दलित मुस्लिम की आबादी देश मे सर्वाधिक है।

अब मूल विषय पर बात यह करनी है कि समाजवादी पार्टी का गठन सन 1992 में हुआ। गठन के बाद से अब तक 45 से 50 चेहरे पार्टी की ओर से राज्यसभा भेजे जा चुके हैं जबकि समाजवादी परचम लहराने से लेकर सरकार बनाने में पसमांदा मुसलमान ने सबसे बड़ी भूमिका अदा की और लगातार ऐसा करता चला आया। खास बात यह है कि पसमांदा मुस्लिम समाज ने सपा के बेस वोट यादव बिरादरी से दोगुना वोट देकर सपा का साथ दिया। इसके बावजूद अब तक इस समाज से न किसी को संगठन का प्रदेश अध्यक्ष या फिर फ्रंटल संगठन का पदाधिकारी बनाया गया और न ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ही कोई जगह दी गई, राज्यसभा भी नही भेजा गया। उल्टे स्वार्थ निकलने के बाद पसमांदा समाज को बिसरा दिया गया।पिछड़ों के हक़ व उनके संघर्ष के लिए बात करते हैं भाषण भी देते हैं इसके ठीक उलट पिछड़ी पसमांदा बिरादरी को तरजीह देने से ही परहेज कर रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव में पसमांदा समाज को नजरअंदाज किया गया। 15 फीसदी अशराफ (सवर्ण) मुसलमानों को टिकट दे दिया गया। जबकि वह जन्मजात कांग्रेसी हैं। चुनाव परिणाम से तस्वीर भी साफ हो गई। अगर आप वास्तव में भूल सुधार करना चाहते हैं तो पसमांदा समाज को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के साथ ही आसन्न लोकसभा चुनाव 2024 में टिकट देकर चुनाव लड़ने का मौका दिया जाए। यह स्पष्ट कर देना भी उचित होगा कि पसमांदा समाज की हिस्सेदारी तय किये बिना आपकी जीत नामुमकिन है।

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