लखनऊ। समाजवादी पार्टी के नए मुखिया अखिलेश यादव शूद्र के नाम पर राजनीति कर खुद को काबिल नेता साबित करने पर तुले तो हैं पर वास्तव में शूद्र पसमान्दा मुसलमान की बात वह क्यों नही करते, अपना किया धरा जनता के सामने रख दें तों दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अखिलेश हक़ीक़त से दूर भागने में माहिर हैं और यही उनकी राजनीति का एक सच भी है।
यह बात आल इंडिया पसमान्दा मुस्लिम महाज़ के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने अपने एक बयान में कही। उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव को शूद्रों की वास्तव में फिक्र है और वह इस समाज का वास्तव में भला करना चाहते हैं तो उन्हें मजबूती से पसमान्दा मुस्लिम समाज के साथ खडे हो जाना चाहिए था। शूद्र के नाम पर बहस छेड़ कर खुद को शूद्र कहला कर वह चर्चा में भले आ गए लेकिन वह शूद्र की असली तस्वीर जनता के सामने नही रख सके, जनाब अखिलेश को यह पता होना चाहिए कि शूद्र असल में वह नही बल्कि पसमान्दा मुस्लिम समाज है जो हर लिहाज से पिछड़ा हुआ है। जिसे बुनियादी तरक्की की जरुरत है।
वसीम राईन ने कहा कि अखिलेश यादव ने न ही पसमान्दा समाज से राज्य सभा में प्रतिनिधित्व तय किया, सरकार में जगह दी और न ही संगठन में ही किसी को जिम्मेदारी सौंपी। यहाँ तक कि अब तक पसमान्दा समाज से किसी को प्रदेश अध्यक्ष तक नही बनाया है। सच्चर समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि पसमान्दा मुसलमान क़ी हालत दलित से भी बदतर है, इसी तरह निमेष कमीशन व रंगनाथ मिश्र कमेटी की रिपोर्ट भी पसमान्दा मुस्लिम समाज के हित में थीं, यह रिपोर्ट अमल में आ जाती तो पिछड़ेपन का धब्बा लिए यह समाज आज संघर्ष न कर रहा होता। सपा की सरकार बनने के बाद भी सिफारिश लागू करने के वादे पर भी कोई अमल नही किया गया। आखिर किस मुंह से अखिलेश शूद्र समाज के भले की बात कर रहे हैं, उनकी राजनीति केवल स्वार्थ के आस पास घूमती है और इसी के बल पर वह सत्ता में आते रहे। महाठगबंधन भी इसी कोशिश का एक हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि दूसरों को घेरने से पहले अखिलेश को खुद के बारे में सोंच समझ लेना चाहिए। मतलबपरस्ती तो कोई उनसे सीखे, वह चलती फिरती पाठशाला हैं।