बहुजन समाज पार्टी ने सिर्फ़ पसमांदा मुसलमानो को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया हैं वसीम राईन

बहुजन समाज पार्टी ने सिर्फ़ पसमांदा मुसलमानो को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया हैं वसीम राईन

राजनीतिक दलों की यही विडंबना है कि जिन मतों की एकजुटता के सहारे चुनाव जीतकर सत्ता सुख भोगने का मौका मिलता है, उन्ही मतदाताओं को मतलब निकल जाने पर हाशिये पर कर देना इनकी फितरत बन चुकी है। जागरूक होकर वही दबा कुचला शोषित पीड़ित समाज ऐसे मतलबपरस्त दलों को सबक सिखाने के लिए मजबूर हो जाता है। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया जी इसी राह पर चलती आई हैं। कोरे वायदे कर लुभाकर लालच देकर बरगला कर पसमांदा समाज का वोट हासिल कर सत्ता सुख भोगती आई बसपा आज पहचान बनाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रही है। देश की 85 फीसदी पसमांदा मुस्लिम आबादी को बेवकूफ बनाकर 15 फीसदी अशराफ मुसलमानों के सहारे लम्बी पारी खेलने के इरादे आज जमीन छू रहे हैं।

याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया बहन मायावती जी कई बार सत्ता में रही और उनके दल को सत्ता तक पहुचाने में पसमांदा मुस्लिम समाज ने बड़ी भूमिका अदा की। यह समाज हर उस दल से आशान्वित रहा जिसने सत्ता में आने के लिए तमाम वायदे किए और सरकार में आते ही सब भूल गए। जैसे कि बसपा मुखिया ने दलितों व पिछडो के हित के नाम पर बयानबाजी की पर पसमांदा समाज को सत्ता से लेकर सदन व संगठन तक कहीं कोई मौका नही दिया। जबकि वह चाहती तो विधान परिषद में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता था। संगठन में कोई ओहदा देना मुनासिब नही समझा गया जबकि पसमांदा मुस्लिम ने पूर्ण रूप से बसपा का साथ दिया। सत्ता में जगह नही दी गई जबकि बसपा मुखिया इस दलित मुस्लिम समाज के असल हालात से बखूबी रूबरू हैं। इस समाज को बसपा से कोरे वादे और धोखा ही मिला, ऐसी स्थिति में बसपा को कांग्रेस सपा की ही कड़ी में रखना गलत न होगा। 85 फीसदी का सहारा न बनकर 15 फीसदी अशराफ यानी सवर्ण मुसलमान को भरपूर तरजीह दी गई जो मूल रूप से कांग्रेसी और विदेशी है और वह किसी का होने के बजाय सिर्फ सत्ता के साथ ही खड़ा हुआ। अशराफ मुसलमान सिर्फ सत्ता सुख भोगने में ही लिप्त रहे, किसी के काम नही आ सके।
दलित पिछडो के हित के लिए लम्बे आंदोलन की कलई खुलना स्वाभाविक है। बसपा कई बार सत्ता में रही, इनकी सरकार बनवाने के लिए प्रदेश के दलित पसमांदा मुस्लिम समाज ने अहम भूमिका निभाई, इसके बावजूद पसमांदा समाज को सत्ता से लेकर संगठन तक कहीं भी तरजीह नही दी गई। यह नाइंसाफी बहुत अफसोसजनक है। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि रिश्ते सुधारने की दशा में बसपा को पसमांदा समाज से लोगों को संगठन में जिम्मेदारी देनी होगी। साथ ही आसन्न लोकसभा चुनाव 2024 में टिकट देकर मैदान में उतारना होगा। समाज जिसके साथ गया साथ चला वह कभी सत्ता सुख से वंचित नहीं रहा। आखिर इस समाज को भी वक्त के साथ कदमताल करना होगा वरना पिछड़ेपन का लगा तमगा कभी हटने से रहा। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व राजनीतिक मोर्चे पर तरक्की बिना सत्ता में हिस्सेदारी के संभव नहीं है और अब तक छले गए पसमांदा मुस्लिम समाज को पिछड़ेपन से पीछा छुड़ाना ही होगा। वरना राजनीतिक दल अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाले। बसपा मुखिया को इस बड़े समाज का साथ पाने के लिए समाज की जरूरतों को समझना ही होगा।