धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ कर समाज को बांटने व बिरादरियों को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल करने वाले दलों की कलई अब खुल गई है। राजनीतिक ही नही सामाजिक बदलाव का ही फेर है कि आज इन दलों को जमीन तलाशने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। भेदभाव और बंटवारे की राजनीति ज्यादा वक्त नही चलती।
यह बात आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने अपने बयान में कही है। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्ष का मतलब स्पष्ट है कि सभी को बराबरी की नजर से देखना। अब जरा समाजवादी पार्टी की हरकतों पर नजर डालते हुए इनकी समाज को बांटने वाली राजनीति पर ध्यान दिया जाए तो इन्हें किसी भी सूरत में धर्मनिरपेक्षता का हिमायती नही कहा जा सकता। जैसे कि देश की 85 फीसदी पिछड़ी दलित पसमांदा मुस्लिम आबादी को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल कर इधर उधर भटकने के लिए छोड़ दिया गया। इस समाज के हक़ व जरूरतो को सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया। दशको वोट हासिल कर सत्ता में बारी बारी से तीनों दल आते रहे पर इस समाज की उन्नति की बात कभी नही की गई।
वसीम राईन ने कहा कि खुद को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले इन दलों पर से पर्दा गिर चुका है।सवाल यह है कि अगर यह दल पसमांदा समाज को हाशिये पर रखकर उनके अधिकारों को कुचलकर खुद को धर्मनिरपेक्ष कहलाना चाहते जवाब साफ है फ़रीद किदवई अब आरोप लगा रहे हैं ख़ुद पूरा परिवार पसमांदा मुसलमानो पर ज़ुल्म करते रहे हैं