पिछड़ो के मसीहा थे कर्पूरी ठाकुर -वसीम राईन

पिछड़ो के मसीहा थे कर्पूरी ठाकुर -वसीम राईन

बिहार के दो बार मुख्यमंत्री और दूसरे उप मुख्यमंत्री रहे जननायक कर्पूरी ठाकुर हमेशा लोगों के दिलो में जिंदा रहेंगे। इतने अहम पदों पर रहने के बावजूद उनकी सादगी प्रेरित करने वाली है। आम बनकर रहना तो आज के राजनेता कर्पूरी ठाकुर से सीखे। उनका पूरा जीवन एक पाठशाला है।
यह बात आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने जिला कार्यालय पर जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर आयोजित के बैठक में कही। उन्होंने अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि आजादी के बाद एक बार भी विधायक, विधान पार्षद बनकर लोग करोड़ों के मालिक हो जाते हैं। शहरों में उनके आवास बन जाते हैं लेकिन, कर्पूरी ठाकुर उन तमाम लोगों से अलग थे। उन्होंने समाजवाद को अपने जीवन में उतारा। जीवन पर्यंत राजनीति के उच्च मापदंड को बनाकर रखा। जिसमें, ईमानदारी और जनता के प्रति जवाबदेही को स्वीकार किया। वसीम राईन ने कहा कि उनकी सादगी ऐसी थी कि अपने गांव के घर को उन्होंने कभी भी नहीं बनवाया। 17 फरवरी 1988 को कर्पूरी का निधन हुआ तो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा उनके गांव पहुंचे। समस्तीपुर के पितौंझिया गांव में जब हेमवती नंदन बहुगुणा पहुंचे तो उन्होंने घर की स्थिति देखी। उनकी आंखों से आंसू फूट पड़े। उन्होंने कहा कि दो बार का सीएम भी अपने बच्चों के लिए घर नहीं बनवाया। ऐसे नेता बिरले ही होते हैं। हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए चौधरी देवीलाल ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से कहा था कि कर्पूरी जी कभी आपसे पांच-दस हजार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना। यह पैसे मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा। देवीलाल बाद में अपने मित्र से कई बार पूछा था कि कर्पूरी जी ने कुछ मांगा। हर बार मित्र का जवाब होता, नहीं, वे तो कुछ मांगते ही नहीं हैं। ऐसा था कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देकर एक बड़ी लकीर खींच दी। ओबीसी पॉलिटिक्स को उन्होंने धार दी थी। 24 जनवरी 1924 को जन्में कर्पूरी ठाकुर बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। सीएम के रूप में वे दो बार कार्यभार ग्रहण किया। कुल ढाई साल बिहार का शासन उनके हाथ रहा था। वर्ष 1952 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद वे कभी भी हारे नहीं। बैठक में संगठन के अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित रहे।

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