लखनऊ। बेहतर होता कि डा. लोहिया कांग्रेस मुक्त भारत देखने के लिए मौजूद होते। भले मौजूदा कॉरपोरेट समाजवादियों को देखकर उनकी आत्मा को कष्ट पहुंचता। वह आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका सपना जरूर भाजपा ने पूरा कर दिया है। अंग्रेजों की मानसिकता वाली कांग्रेस से छुटकारा पाकर हर राज्य और राष्ट्र खुद को आजाद महसूस कर रहा है।
यह बात आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने प्रखर राजनीतिज्ञ, कुशल वक्ता व लेखक डा. राममनोहर लोहिया की जयंती पर उन्हे नमन करते हुए अपने बयान में कही। उन्होने कहा कि डा. लोहिया जिस समाजवादी विचारधारा के पक्षधर थे, उस विचारधारा का आधुनिक व कथित समाजवादियां ने कबाड़ा करके रख दिया। वर्तमान नेताओं ने उनके नाम का सहारा लेकर समाजवाद को व्यक्तिवाद स्वार्थवाद व अर्थवाद में बदल कर रख दिया। डा. लोहिया आज होते तो समाजवाद का बंटाधार करने वालो को देखकर बहुत दुखी होते, वह देखते कि किस तरह आज का समाजवाद कॉरपोरेट घराने में बदल दिया गया है, डॉ लोहिया के समाजवाद की आत्मा को रौंद कर आज के नेता मतलबपरस्ती की दुकान चला रहे हैं। मंजिल से भटक गए और सत्ता लोलुप हो चले हैं। सरकार में बने रहने के लिए हर तरह के समझौते पर उतर आए हैं। वहीं कांग्रेस मुक्त भारत देखकर उनकी खुशी का कोई ठिकाना न होता। डॉ लोहिया ने जिस भाजपा को कभी अच्छा नही समझा, उस दल ने उनका सपना पूरा कर दिया। काग्रेस मुक्त भारत की सोच डा राममनोहर लोहिया की थी। आज देश के लगभग प्रान्त कांग्रेस मुक्त सरकार की ओर अग्रसर हैं। प्रदेश अध्यक्ष ने डा. लोहिया की जीवन यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डा. लोहिया मुखपृष्ठ पर नहीं हैं। उनकी नीतियाँ और वैचारिक चिंतन अब गैर कांग्रेसी सरकारों से ओझल हो चुका है। लोहिया जी का वैचारिक अतिवाद युवाओं में जोश फूंकने वाला था। जब वह हुंकार भरते थे ‘भूखी जनता चुप न रहेगी, धन और धरती बंट के रहेगी‘ तो सरकार डोल जाती थी। उनके भाषण, लेख, नारे लोगों को आकर्षित करते थे। लोहिया के लेख आज भी उद्वेलित करते हैं। लोहिया के व्यक्तित्व में एक गजब का साम्य रहा। वे एक ओर जहां गांधी के अतिप्रिय थे वहीं वे भगत सिंह के विचारों को जीते थे। अजब संयोग यह कि 23 मार्च भगत सिंह की फांसी का दिन तो इसी तारीख को लोहिया की जयंती भी है। 1944 में लोहिया को अंग्रेजों ने लाहौर के किले की उसी कालकोठरी में रखा था जहां भगत सिंह को फांसी के पहले तक रखा गया था। वसीम राईन ने कांग्रेस से डा. लोहिया के विमुख होने की चर्चा करते हुए बताया कि 1942 के बाद उनके और नेहरू के बीच तीखे मतभेद शुरू हो गए। वजह नेहरू येनकेनप्रकारेण सत्ता हस्तांरण चाहते थे जबकि लोहिया संपूर्ण आजादी। इसलिए जब विभाजन की त्रासदी के साथ देश आजाद हुआ तो गांधी की तरह उन्होंने भी आजादी का जश्न नहीं मनाया। डॉ लोहिया भारत में समाजवादी आन्दोलन के अलम्बरदार थे। विपक्ष क्या होता है? भारतीय लोकतंत्र को पहली बार यह बताने वाले राम मनोहर लोहिया ही थे। लोहिया शासकों के लिए आतंक थे। गरीबों के लिए हौसला थे। गिरे हुए के लिए प्रेरणा थे। बेजुबान की आवाज थे। वे भीड़ के नेता नहीं थे। सिद्धान्तों के लिए साथियों को भी छोड आगे बढ़ते थे। वे आत्मा से विद्रोही थे। लोहिया चले गए। उनके विचारों को कोई नहीं मिटा सकता। समाजवादी आन्दोलन की दूसरी, तीसरी पीढी क्यों नहीं बनी? यह सवाल अहम है। उन्होने कहा कि वर्तमान परिवेश में देश के राजनीतिज्ञों को डॉ राममनोहर लोहिया के वैचारिक चिंतन की आवश्यकता है। लोहिया के विचार ही अंत्योदय से सर्वोदय तक समाज को लाभान्वित कर सकते है।