बसपा सरकार में एक भी मन्त्री पसमांदा मुस्लिम नही था वसीम राईन

बसपा सरकार में एक भी मन्त्री पसमांदा मुस्लिम नही था वसीम राईन

बाराबंकी। दलितों के नाम पर राजनीति कर नाम, पहचान व सरकार बनाने वाली बहन मायावती को दलित पसमांदा मुस्लिम कभी नजर नहीं आया। इसी समाज के वोटों के सहारे सत्ता का स्वाद चख चुकीं बहन जी ने हमेशा पसमांदा मुस्लिम की उपेक्षा की। सरकार बनते ही विदेशी मुसलमानों को गोद में बिठाया जबकि पसमांदा मुस्लिम अपनी बारी आने की राह ही तकता रह गया।
यह बात आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने अपने बयान में कही। उन्होने कहा कि वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी, बहन जी ने मुख्यमंत्री पद संभाला और 49 मंत्रियों वाला मंत्रिमंडल तैयार किया। सर्वाधिक मंत्री पद के लिए चेहरे पार्टी के नेता ही रहे। एक भी मंत्री पसमांदा मुस्लिम समाज से नही बनाया गया, जबकि वह योग्यता रखते थे। तीन चेहरे मुस्लिम रहे वह भी अशराफ (विदेशी )मुसलमान चुने गए। चुनाव में टिकट वितरण किया तों उसमे भी अशराफ (विदेशी)मुसलमानो को ही तरजीह दी गई, वजह साफ है अशराफ मुसलमान धनबल से लेकर रसूख तक काफ़ी मज़बूत रहे और बहन जी की पहली पसंद भी यही थीं। जबकि बहन जी को सरकार में लाने के लिए सबसे बड़ा योगदान पसमांदा समाज का रहा। बिना किसी शर्त व स्वार्थ के पसमांदा मुसलमान बहन जी के साथ रहा। मानवता के नाते ही सही पर बहन जी को इस समाज का ख्याल रखना चाहिए था, लेकिन बहन जी को सिर्फ अशराफ मुसलमान से ही मतलब रहा।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि हैरत इस बात की है कि बसपा की नींव दलित समाज है। बहन जी का आधार वोटबैंक दलित है और दलित राजनीति करके ही बहन जी का नाम हुआ पहचान बनी। फिर उन्होने दलित पसमांदा मुस्लिम को क्यों उसके भाग्य के सहारे छोड़ दिया, सत्ता में मौका क्यों नहीं दिया, संगठन में जगह क्यों नहीं दी, विधान परिषद के लिए सिफारिश क्यों नहीं की। साफ है कि बहन जी कभी पसमांदा समाज के पक्ष में नहीं रहीं, समाज में दिखावे की राजनीति ही उनकी असल पहचान रही, दलितों में भी भेदभाव किया। नेकनीयती से साथ देते आए पसमांदा समाज के साथ धोखेबाजी की।
वसीम राईन ने कहा कि नीति और नीयत में खोट रखने वाले दल की उम्र अधिक लंबी नहीं होती। आज बसपा पहचान के लिए तरस रही है, दलित समाज नेतृत्व की खामोशी को लेकर हैरान परेशान है और बहन जी यदा कदा बयानबाजी कर राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। दलितों नाम पर राजनीतिक जीवन और दलित पसमांदा मुस्लिम से परहेज मुस्लिमो के गले नीचे कभी नहीं उतरा। वक्त रहते पसमांदा समाज भी जागरूक है और तय कर चुका है कि बिना हिस्सेदारी के आगे कोई बात नहीं होगी।

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