सपा ने हिस्सेदारी नही मुज़फ़्फ़रनगर दंगा ज़रूर दिया-वसीम राईन

सपा ने हिस्सेदारी नही मुज़फ़्फ़रनगर दंगा ज़रूर दिया-वसीम राईन

देश की 85 फीसदी दलित पिछड़ी पसमांदा आबादी को राजनीतिक दलों ने बारी बारी से ठगा व छला है। सत्ता में आने के लिए शत प्रतिशत इस्तेमाल करने के बाद इस आबादी को संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया गया। समाजवादी पार्टी ऐसे ही राजनीतिक दलों की एक अहम कड़ी है, सूबे से लेकर केंद्र तक सत्ता का सफर कर आई इस पार्टी को सिर्फ वोट हासिल करना ही आया, दलित मुस्लिम की तरक्की का सवाल उपजा तो एक एक कर सारे नेता अपने बिलो में लौट गए। क्या यही समाजवाद है ? लोहिया जी की सोंच से ठीक उलट उनके विचारों से गया गुजरा।
1992 में अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी को संघर्ष से सत्ता तक ले जाने में दलित यानी पसमांदा मुस्लिम समाज ने नींव के पत्थर की मानिंद भूमिका4 निभाई और लगातार साथ देते रहे। जब जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तब तब पसमांदा समाज को आस लगी कि अब शायद इस समाज का ख्याल किया जाए लेकिन यह आस निराशा में ही बदलती गई। पसमांदा समाज को वोटबैंक की तरह सपा ने उसी तरह इस्तेमाल किया जैसे कांग्रेस ने वोट लेकर बरसो राज किया लेकिन हक़ व हुकूक के नाम पर सिर्फ झुनझुना थमाते रहे।

यह कहना जरूरी हो जाता है कि सपा के अस्तित्व में आने के बाद तमाम लोगो को राज्यसभा भेजा गया। संगठन में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। सत्ता में आने पर मंत्रिपद से नवाजा गया। अनेको संस्थाओं, निगमो व आयोग में करीबियों को अहम जिम्मेदारी दी गई बस पसमांदा समाज ही ऐसा रहा जिसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सिरे से नकार दिया। यह हाल तब रहा जब पार्टी के मूल यादव बिरादरी के वोट से दोगुना वोट देकर पसमांदा समाज ने समाजवादी पार्टी को सत्ता के सुख से वंचित नही होने दिया,5 वोट के बदले समाज के लिए कुछ न करने के बावजूद दलित मुस्लिम इनके सत्ता में आने का रास्ता साफ करता गया। हैरत की बात तो यह है कि इस दल के बड़े नेता पिछडो के अधिकार, उनके उत्थान और सामाजिक तरक्की के लंबे चौड़े भाषण तो देते हैं पर वोटबैंक बनी 85 फीसदी आबादी की तरक्की के नाम पर अब तक धोखा ही देते आये हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में आस जगी थी पर पसमांदा समाज को हाशिये पर ही रखा गया। न टिकट मिला और नही संगठन में जिम्मेदारी। 15 फीसदी अशराफ मुसलमानों को सर आंखों पर बिठा चुके सपा नेता समाजवाद की खोखली राजनीति करते आये हैं। इनका समाजवाद देख लोहिया को भी अपार कष्ट हो रहा होगा। यही वजह रही कि 85 फीसदी को बिसरा कर सत्ता का ख्वाब संजोने वाली पार्टी दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है और आगे भी रहेगी।
आखिर इनको मतलबी क्यों न कहा जाए, 2012 में सत्ता में आने से पहले सपा ने वादा किया कि निर्दोष मुसलमानों को जेलों से रिहा कराया जाएगा। साथ ही सच्चर कमेटी रंगनाथ मिश्र व निमेष कमीशन की रिपोर्ट्स को लागू किया जाएगा। पसमांदा मुस्लिम ने इन पर भरोसा करके सत्ता में आने का रास्ता साफ कर दिया। सरकार में आने के बाद कमेटी की रिपोर्टस तो नही लागू हो सकी बल्कि मुजफ्फरनगर का दंगा जरूर ईनाम में मिल गया।
समाजवाद की नींव बनकर रहे पसमांदा समाज को इस बात का एहसास हो चला है कि सपा जैसे दल सिर्फ फरेबी हैं मतलबपरस्त हैं इनका काम सिर्फ वोट हासिल करना है इनसे सामाजिक आर्थिक शैक्षिक उन्नति की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखने जैसा ही है। पसमांदा समाज सत्ता सुख देना और छीनना बखूबी जानता है आज यह समाज जागरूक और सतर्क है। यूं ही इस्तेमाल नही होने वाला, जो समाज वक़्त रहते जाग जाता है वही अपना भला कर सकता है।

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