अदम्य साहस वीरता की अद्भुत मिसाल थे वीर अब्दुल हमीद- वसीम राईन

अदम्य साहस वीरता की अद्भुत मिसाल थे वीर अब्दुल हमीद- वसीम राईन

बाराबंकी। अदम्य साहस वीरता और देशभक्ति से ओतप्रोत वीर अब्दुल हमीद हमेशा आमजन के दिलो में बसे रहेंगे। उनकी कुर्बानी देश के लिए बेहद अनमोल है। युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा लेकर राष्ट्रवाद की राह पर चले और जरूरत पड़ने पर खुद को राष्ट्र के नाम पर न्यौछावर कर दे। बस यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यह बात आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन ने अपने आवास पर वीर अब्दुल हमीद की जयंती पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा मे कही। उन्होंने बताया कि
वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गाँव में एक जुलाई 1933 में एक साधारण, मसऊदी (डफाली) परिवार में हुआ था। वह पसमांदा समाज मे दर्जी बिरादरी से आते थे। उनकी माता का नाम सकीना बेगम और पिता का नाम मोहम्मद उस्मान था। कहा कि अब्दुल हमीद मसऊदी 27 दिसम्बर 1954 को भारतीय सेना के ग्रेनेडियर रेजीमेंट में भर्ती हुए। बाद में उनकी तैनाती रेजीमेंट के 4 ग्रेनेडियर बटालियन में हुई।जहां उन्होंने अपने सैन्य सेवा काल तक अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने अपनी इस बटालियन के साथ आगरा, अमृतसर, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, नेफा और रामगढ़ में भारतीय सेना को अपनी सेवाएं दीं।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने उनके साहस की चर्चा करते हुए कहा कि भारत-चीन युद्ध के दौरान अब्दुल हमीद मसऊदी की बटालियन सातवीं इंफैन्ट्री ब्रिगेड का हिस्सा थे, जिसने ब्रिगेडियर जॉन दलवी के नेतृत्व में नमका-छू के युद्ध में पीपल्स लिबरेशन आर्मी से लोहा लिया। इस युद्ध में सेकेंड लेफ्टिनेंट जीवीपी राव को मरणोपरांत अद्भुत शौर्य और वीरता के प्रदर्शन के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। अब्दुल हमीद मसऊदी के सम्मान से पहले इस बटालियन को भारत की स्वतंत्रता के पश्चात मिलने यह सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार था। उन्होंने अपने सेवा काल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मान प्राप्त किया था। 1965 के युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें पहले महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। सारा देश उनकी बहादुरी को प्रणाम करता है।इस अवसर पर निसार राईन, मैनुद्दीन अंसारी, सईद राईन,महमूद चौधरी,इमरान राईन,सरफ़राज़ सिद्दीक़ी आदि लोग मौजूद थे!

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